कविता

मेरी दो कवितायेँ

१. भागती ज़िन्दगी

ठण्ड के बीच बदलता मौसम ,
हवा, धूल और गर्द भी ,
आदमी ज्यों लुट कर,
कर उठे हाहाकार .
हाफती दुनिया के बीच ,
कितना निरुद्देश्य सब,
विस्मय भरा परिवेश,
पाओ , भोगो,फेको ,
चाह हर पल नवीनता की .
चादर छोटी ,
इच्छाए गुब्बारे सी,
कल्पनाएँ दिवास्वप्नों भरी,
उड़ रहीं कपोत सी
पाखें पसार .
लक्छ्यहीन गति का प्रवाह ,
आदमी के मन में
मात्र सफल हो जाने की होड़ ,
दंभ निज की उपलब्धियों का ,
आदर्शच्युत भागम भाग.
अभावग्रस्त, भयग्रस्त
आज की दुनियां,
आदमी की ज़िंदगी को
बना रही
तनाव, ठण्ड और गर्द से
सनी हुई.
२६ दिसम्बर , १९५८.
लखनऊ विश्वविद्यालय ( छात्रावास)


२.आदमी की जिजीविषा

काल के पहियों पर
घूमता, चढ़ता , गिरता ,
थक कर हाफता हुआ भी ,
अपनी भुजाओं से
जीवन को नित नयी गति देता ,
रंग नए फेरता ,
गहराए तम के बीच से
नित नई ऊषा उगाता रहा,
जीवित रहा , जीवित हूँ
और जीवित रहूँगा.
चोटें खाकर के
अंधी बर्बरता की ,
क्रूरता भरी पशुता की,
युद्ध , अकाल,महामारी
के ठोकरों की
गाथा कढ़ी पुट्ठों में.
फिर भी ,
सदियों के अपने
इतिहास से
अर्जित जिजीविषा से ,
गिरता, उठता ,लड़ता ,
प्रतिपल बनाता रहा
अजन्ता, वीनस ,
रति, कामदेव .
गढ़ता रहा
पुराण, इतिहास ,
सृजित करता रहा
नित नए स्तवन ,
मर कर भी ,
मृत्यु को पलट कर
जीता रहा.
पहली जनवरी, १९६२
गोरखपुर विश्वविद्यालय ( गोरखपुर)

No comments:

Post a Comment