समीक्षा


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  1. मेरी कहानी 'नया वर्ष ' पर 'नई कहानिया' में( फरवरी , १९६४) प्रकाशन के अवसर पर कमलेश्वर जी की सम्पादकीय टिप्पणी.

    " आज का मध्य वर्ग जिस भावनात्मक संकट से गुजर रहा है और स्त्री- पुरुष के संबंधों की जो मूल समस्या दैहिक, मानसिक और बौद्धिक स्तर पर आज और भी प्रखर हो गयी है, उसी की कहानी है यह. हुआ यह है कि तरह तरह के दबावों में जहाँ व्यक्ति की सत्ता खंडित हुई है , वहां उसका आतंरिक मानस भी चटका है और वह अब व्यक्ति सम्मत और समाज सम्मत मूल्यों में एक नए संतुलन की खोज में व्यस्त है. फ़िलहाल यह खोज व्यक्तियों की एकांतिक अकुलाहट तक निहित है और भीतर से जगह जगह टूटे हुए लोग नज़र आते है… ऐसे लोग जिन्हे कोई भी आत्मीय क्षण खोल कर रख देता है और उनका दुःख अनायास बह पड़ता है. हर वयस्क व्यक्ति अपने भीतर के इस कष्ट से आक्रांत है फिर भी वह एक सामाजिक इकाई के रूप में सब कुछ बहन करता है.
    इस कहानी में एक बहुत आत्मीय क्षण मुखरित हुआ है- एक ऐसा क्षण, जो सच था, जिसे झुठला कर ज़िंदगी दूसरी राह पर चली गई और उसी क्षण की दूरस्थ आवाज़ उमड़ घुमड़ कर आती है और सार्थकता चाहती है. यह समस्या मात्र व्यक्ति की नहीं है , व्यक्तितों की भी नहीं है , एक पूरी पीढ़ी की हैऔर इसलिए इसके सामाजिक आशय भी हैं. यह कहानी और इस तरह की कहानियां कभी जीवन की नीरसता ,उदासी, कुंठा,को ज़्यादा मुखर रूप से प्रस्तुत कर जाती हैं , पर ऐसी रचनाएँ उस बिंदु तक भी पहुचती हैं, जहाँ पहुँच कर इन कटु स्थितियों को सहन करना असंभव हो जायेगा और खोज प्राप्ति में बदलने के लिए मज़बूर होगी.
    इस कहानी में जो कुछ कहा गया है , उससे भी ज़्यादा परिवेश के माध्यम से व्यक्त हुआ है और अभिव्यक्ति की सहजता ने इसे एक उदास गीत की लय दी है. पिछली पीढ़ी ने जिन मूल्यों का वरण कर एक सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए नई पीढ़ी के व्यक्ति को आशीर्वाद स्वरुप और बहुत ही ईमानदारी से जो सामाजिक और पारिवारिक जीवन दिया था -उसके सामने आज एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा है। और इसीलिये सरिता के पिता जी स्वयं ही आज उससे पूछते हैं- बेटी क्या सोचा?"
    सभी यही पूछ रहे हैं.लगता है नया वर्ष आ गया है, अख़बारों के विशेषांक,सुबह की कुहरे मिली धूप, शुभकामनाएं,कैलेण्डर का बदल जाना क्या इसके अलावा भी नया वर्ष कुछ ले आयेगा? कहानी का यह प्रश्न ज़िंदगी प्रश्न भी है जिसे लेखक ने बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया है. "
    यह कहानी मेरी कविताओं- कहानियों की पुस्तक 'समवेत'( यश पब्लिकेशन्स , नई दिल्ली, २० १०) में अन्य पांच कहानियों- धूप भरी घाटियां,एक शाम,वर्षगांठ, चीड़ बन के बीच और पुरइन के साथ संकलित है.

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  2. इधर प्राप्त पत्रिकाएं
    दस्तावेज़ संपादक डॉ विश्वनाथ तिवारी गोरखपुर
    पक्षधर-संपादक-डॉ विनोद तिवारी, दिल्ली
    परिचय-संपादक श्रीप्रकाश शुक्ल, वाराणसी
    कैमूर टाइम्स-संपादक विजय शंकर चतुर्वेदिसोनभद्र ( उ प्र__
    पहली तीन पत्रिकाएं मूलतः साहित्यिक पत्रिकाएं हैंजिनमें उत्कृष्ट साहित्यिक सामग्री हैटीनों केसम्पादक साहित्य में स्तापित हैं और वे किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं.कैमूर्तिमेस में मुख्य बल राजनीतिक समाचारों और उनके बौद्धिक विश्लेषण पर हा.मैं हिंदी के पाठकों से इन पत्रिकाओं को लेन के लिए विशेष रूप से आग्रह करूंगा. विजयशंकर चतुर्वेदी जी और उनकी टीम के कई लोग हिंदी पत्रकारिता के जाने माने नाम है.नेपालकी घटनाओं और बिहार की चुनावी राजनीति का इस अंक में विश्लेषण बहुत ही खोजपूर्ण और महत्वपूर्ण है. अन्यं तीन पत्रिकाओं की साहित्यिक सामग्री हर दृष्टि से स्तरीय और पठनीय HAI

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